किसी भी देश की संस्कृति की झलक उसके नागरिकों के वस्त्रों में देखी जा सकती हैI साड़ी भी भारतीयता को व्यक्त करता हुआ ऐसा परिधान है, जिसकी यात्रा 5000 वर्ष पुरानी है और अब भी अनवरत जारी है।
इस बिना सिले वस्त्र ने अपने इस वर्तमान स्वरूप में आने के लिए इतनी लंबी यात्रा तय की है। इसीलिए साड़ी को हम भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाला परिधान कह सकते हैं। समय के साथ साड़ी के कपड़े,पैटर्न तथा रंग में बदलाव आते रहते हैं। यही कारण है कि साड़ी नवीनता लिए रहती है और आधुनिक फैशन के अनुकूल भी बनी रहती है। विश्व का शायद ही अन्य कोई परेशान इतना पुरातन और अब तक प्रचलित हो। ऐसा अनूठापन ही साड़ी को अद्वितीय बनाता है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत है।
साड़ी प्रत्येक भारतीय नारी के संग्रह में अनिवार्यतः मिलेगी, यह नारी के सौंदर्य में अभिवृद्धि कर उसे और अधिक आकर्षक और मोहक बनाती है। प्रत्येक विशिष्ट अवसर पर भारतीय महिला का प्रथम चयन साड़ी ही होती है। सलवार-सूट और पाश्चात्य परिधानों की भीड़ में भी साड़ी ने अपनी एक अलग पहचान कायम रखी है। सदाबहार इस परिधान के स्वरूप में परिवर्तन की न्यूनतम गुंजाइश होते हुए भी इसमें अनगिनत नए प्रयोग किए जा रहे हैं जो इसे नई पीढ़ी की आधुनिक महिला के मनोकूल बनाते हैं।
साड़ी की व्यापकता और प्रभाव का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि किसी महिला की साड़ी का प्रकार और पहनने का तरीका देखकर उसके क्षेत्र का अनुमान लगाया जा सकता है। महाराष्ट्र की पैठनी हो या गुजरात की पटोला, असम की मेखला चादर हो या केरल की कासवू सबके पहनने का तरीका अलग-अलग है। अलग-अलग राज्यों में विभिन्न प्रकार की साड़ियां बुनी जाती हैं। उत्तर प्रदेश की बनारसी, मध्यप्रदेश के चंदेरी,महेश्वरी, उड़ीसा की बोमकाई, राजस्थान की बंधेज, पश्चिम बंगाल की तांत,बलूचरी, कर्नाटक की बैंग्लोरी सिल्क, छत्तीसगढ़ का कोसा, बिहार की टसर, कम से कम हजार प्रकार की हैंडलूम साड़ियां हैं और नए दौर में पावरलूम तथा मशीन की बनी हुई साड़ियां अलग। इतना विस्तृत संसार है साड़ी का और इसकी गाथा अनंत है। कश्मीर की पश्मीना साड़ी से लेकर तमिलनाडु के कांजीवरम तक, गुजरात के पटोला और भूजैड़ी से लेकर असम की मेखला चादर तक सारे भारत को एक सूत्र में पिरोने का काम करती हैं साड़ी।कम से कम 1000 प्रकार की हैंडलूम साड़ियां और 100 से ज्यादा पहनने के तरीके तो हैं ही, नई पीढ़ी ने और भी अधिक तरीके ईजाद किए हैं,कभी बूट के साथ तो कभी बेल्ट के साथ ।
साड़ी कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम है। किसी के लिए यह कशीदाकारी का मंत्र है तो किसी के लिए चित्रकारों का कैनवास। कोई साड़ी के नए पैटर्न बना सकता है तो कोई ब्लाउज के। इससे जुड़ी ज्वेलरी और दूसरी चीजों की डिजाइनिंग का तो एक अलबेला ही संसार है। अब तो बड़े औद्योगिक घराने भी ब्रांडेड साड़ियां बनाकर बेच रहे हैं।

साड़ी की एक और अनूठी विशेषता है कि यह हर कदकाठी की महिला पर जमती है। किसी को भी महिला को लंबी-ठिगनी, मोटी-पतली जैसे तथाकथित के लेबल दिए जा सकते हैं। पर साड़ी को ऐसा कोई लेबल नहीं दिया जा सकता। यह समरूप से महिला के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति करती है। शारीरिक संरचना में कितना ही परिवर्तन आ जाए, साड़ी हमेशा ही फिट ही रहती हैं। वर्षों बाद भी कोई साड़ी उठाकर पहन ली जाए वह सदाबहार रही है।
साड़ी इतना पुरातन परिधान होने के कारण हमारे अवचेतन की स्मृतियों से होता हुआ हमारे जीन्स में ही समा गया है। इसे भारतीय महिलाओं का अनुवांशिक कपड़ा भी कह सकते हैं। हम इससे एक अलग ही प्रकार का भावनात्मक एवं गहरा जुड़ाव अनुभव कर सकते हैं। अपनी माँ, दादी, नानी, शिक्षिका को तो सदैव हमने इसी परिधान में देखा तो इसके प्रति एक लगाव होना स्वाभाविक है। वह पीढ़ी से हर समय ऐसे पहने रहती थी तब यह कोई विशिष्ट अवसरों पर पहनने वाली वेशभूषा नहीं थी।
भारत में तो साड़ी माँ का आंचल बन ठंडी छांव हुआ करती थी। साड़ी तो जैसे हर लड़की के सपनों की पोशाक हुआ करती थी। माँ की साड़ी को लपेटकर तो हर बच्ची ने इठलाकर खुद को शीशों में देखा होगा और मन में यह परिकल्पना लाई होगी कि बड़े होकर मैं भी इसे ऐसे ही पहनूंगी। बड़ी होकर जो बेटी अपनी माँ की तरह ही उसी भूमिका में आती है तो स्वयं साड़ी पहने वह अपनी माँ का ही प्रतिकृति बन जाती है। मनोविज्ञान कहता है कि हर पुरुष भी अपने जीवनसाथी में अपनी माँ को देखना चाहता है और साड़ी स्त्री में उसी परिकल्पना को साकार करती हैं। यही कारण है कि साड़ी पहनी स्त्री सदैव आकर्षक और मोहक लगती है।

आधुनिक ग्लोबलाइजेशन के युग में कथित तुरंत पहने जा सकने वाले, आरामदायक और ऑफिस के लिए सुविधापूर्ण कपड़े जैसे सलवार कमीज,टीशर्ट-पैंट आदि का प्रचलन हो गया है। साड़ी को केवल विशिष्ट अवसरों शादी-ब्याह, पार्टी आदि पर पहनने का चलन बढ़ गया है। फिर भी साड़ी अपने अस्तित्व की पहचान की मोहताज नहीं है। यह हर जगह पहनी जा रही है, देश की राष्ट्रपति से लेकर खेतिहर महिला तक, ऑफिस जाती वर्किंगवूमेन से ले गए घर की ग्रहणी तक, कान फिल्म फेस्टिवल में अभिनेत्री दीपिका पादुकोण से लेकर मुंबई में मैराथन दौड़ती धाविका भी साड़ी को उसी गरिमा के साथ प्रस्तुत कर रही हैं। यह साड़ी का अनूठापन ही है जो इसे वर्किंगवियर से लेकर पार्टी ड्रेस तक हर स्वरूप में बदलता रहता है। साड़ी महिला को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करती है, यह आधुनिक स्त्रीवाद की मुखरता दर्शाती है।

हर परिस्थिति और देश काल के अनुरूप स्वयं को ढालते रहने के गुण के कारण साड़ी सदियों से अस्तित्व में है और आगे भी इसकी यात्रा जारी रहेगी। यह निश्चित रूप से सदैव भारतीयता, हमारी संस्कृति की पहचान के साथ ही नारीवादिता की भी मुखर अभिव्यक्ति और प्रतीक बनी रहेगी।