पाली उमरिया-शहडोल मार्ग पर, लगभग 36 किमी की दूरी पर स्थित है। उमरिया से एक अन्य सड़क पाली से मंडला होते हुए डिंडोरी जाती है। पाली एक रेलवे स्टेशन भी है, और पर्यटकों के ठहरने के लिए एक विश्राम गृह भी है। स्टेशन को पाली-बिरसिंहपुर स्टेशन के रूप में जाना जाता है। बिरसिंहपुर पाली स्थित बिरासनी मंदिर शहडोल संभाग का सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।

यह मंदिर 10वीं शताब्दी की कलचुरी कालीन आदिशक्ति स्वरूपा महिषासुर मर्दिनी का है, जहाँ विराट स्वरूप में माता बिरासिनी देवी की भव्य प्रतिमा विराजित है, जो काले पत्थर से निर्मित है। मंदिर के गर्भ गृह में माता के पास ही भगवान् हरिहर बिराजमान हैं जो आधे भगवान शिव और आधे भगवान विष्णु के रूप हैं। मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण, मरही माता, भगवान जगन्नाथ और शनिदेव के छोटे-छोटे मंदिर भी स्थित हैं। मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित है। माता की अलौकिक शक्तियों के कारण लोगों की मनोकामनाएं हमेशा पूरी होती हैं और यहां साल भर लोगों की भीड़ रहती है।
माता बिरासिनी देवी के मंदिर परिसर में दो मुख्य प्रवेश द्वार है और एक द्वार पीछे के तरफ है। मंदिर पूरी तरह संगमरमर से निर्मित है। मंदिर के गर्भ गृह में माता बिरासिनी (काली माता) बिराजमान हैं। मंदिर के गर्भ गृह के चारों तरफ अन्य देवी देवताओं के छोटे छोटे मंदिर भी हैं। मंदिर के बाजू में मुंडन स्थल है। मुंडन स्थल के सामने ज्योति कलश स्थल है जो एक विशाल तलघर रूपी हाल है जिसमें नवरात्र में लोगों द्वारा हजारों घी और तेल के ज्योति कलशों की स्थापना की जाती है। यहां वर्ष में दो बार शारदेय व चैत्र नवरात्र में धार्मिक अनुष्ठान किया जाता है जिसमें प्रतिवर्ष हजारों घी तेल व जवारा कलशों की स्थापना की जाती है। हर साल यहां हजारों की संख्या में जवारे बोए जाते हैं। भक्तिमय माहौल के बीच जवारों का विसर्जन किया जाता है। मंदिर परिसर में ही मंदिर का समिति कार्यालय, छोटी धर्मशाला और भण्डारा स्थल है। बिरासिनी माता मंदिर का पुनर्निर्माण बीरसिंहपुर पाली बिरासिनी माता के प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण का प्रारंभ जगतगुरु शंकराचार्य द्वारका शारदा पीठाधीश्वर स्वामी श्री स्वरूपानन्द सरस्वती जी के पावन कर कमलों द्वारा 1989 को किया गया और जो 1999 में संपन्न हुआ।
बिरसिंहपुर पाली स्थित माँ बिरासनी देवी मंदिर (Maa Birasani Devi Temple) में नवरात्र में बोए गये जवारा कलशों का विसर्जन (Jawara Kalash immersion) देखने लायक होता है. लोगों का दावा है कि भारतवर्ष का यह इकलौता आयोजन है, जिसमें इतनी बड़ी संख्या में जवारा कलश एक साथ निकाले जाते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार लोग बाना आदि छेदकर पहनते है और जुलूस में भक्तिमय भाव के साथ शामिल होते है।
